”It is better to live your own destiny imperfectly than to live an imitation of somebody else’s life with perfection”

What will happen when you leave your comfort zone, when you sacrifice your soul to enter into the rat race? What will be the stakes ? This is the part II of सफ़र . 

सफ़र

वो दर्द ही क्या जो आँसूँ ना दे

वो मंज़िल ही क्या जिसमें ठोकर ना लगे

ठोकर खाकर एक सफ़र गुज़रता है

हर मील का पत्थर हमें परखता है

परखकर भी कोई पहचान नहीं

थमी संसो की ज़ुबान नहीं

यही मर्ज़ है इस सफ़र का

मंज़िल आकर भी साहिल का निशान नहीं

फिर भी थके क़दम है चलते

घने अन्धेरे में वो बढ़ते

ढूँढते है दुनिया जिसका नामों निशान नहीं

ढूँढते है ख़ुद को

पर ख़ुद की अब कोई पहचान नहीं।

रंगीन दुनिया में भी है अँधेरा

है इस में भी साया थोड़ा तेरा थोड़ा मेरा

ये साया ही भरता है रंग दुनिया में

ख़ुद कम होकर एक दिया ऐसे जलता है

इस दिये की पहचान नहीं

इस रोशनी पे गुमान नहीं।

 

Aishwarya.

 

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